मिस्टर गुप्ता की शहर में एक छोटी सी दुकान थी। वे कपड़े बेचते थे और अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। उनकी बेटी पूजा दुकान पर बैठकर हिसाब रखती थी।
एक दिन एक अमीर महिला दुकान पर आई। उसने साड़ियाँ देखीं और एक बहुत महँगी साड़ी पसंद की। मिस्टर गुप्ता ने सही दाम बताया। महिला ने भुगतान किया और साड़ी लेकर चली गई।
शाम को हिसाब करते समय पूजा ने देखा कि महिला ने एक हज़ार रुपये ज़्यादा दे दिए हैं। उसने अपने पिता को बताया। "पिताजी," पूजा ने कहा, "वह महिला ज़्यादा पैसे दे गई है। मैं उसे लौटाना चाहती हूँ।"
मिस्टर गुप्ता ने हिसाब देखा। "तुम सही कह रही हो," उन्होंने कहा, "पर हमें उसका पता नहीं है। शायद हम उसे कभी न मिलें।"
पूजा ने दुकान की डायरी देखी। महिला ने अपना नाम और पता लिखा था — वह नियमित ग्राहक थी। "मैं उसे पता लगाकर पैसे लौटाऊँगी," पूजा ने कहा।
अगले दिन पूजा उस महिला के घर पहुँची। महिला हैरान रह गई। "बेटी," उसने कहा, "मुझे तो पता भी नहीं था कि मैंने ज़्यादा पैसे दिए हैं। तुम आज इतनी दूर मुझे एक हज़ार रुपये लौटाने आई हो?"
"जी," पूजा ने कहा, "यह पैसा आपका है। मेरे पिताजी ने मुझे सिखाया है कि किसी का पैसा रखना चोरी है, चाहे वह कितना भी छोटा हो। जो पैसा हमारा नहीं है, उसे हमें लौटा देना चाहिए।"
महिला ने पूजा को आशीर्वाद दिया और कहा, "तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत अच्छी सीख दी है। ऐसी ईमानदारी आज के ज़माने में दुर्लभ है।"
वापस लौटते समय पूजा ने सोचा कि क्या वह सही रास्ते पर है। उसके साथियों ने उसका मज़ाक उड़ाया होता अगर उन्हें पता चलता कि वह एक हज़ार रुपये लौटाने गई है। पर पूजा जानती थी कि उसके पिता की शिक्षा सही है। उन्होंने उसे बचपन से सिखाया था कि जो व्यक्ति छोटी चीज़ों में ईमानदार रहता है, वही बड़ी चीज़ों में भी सही रहता है। पूजा ने अपने पिता की इस बात को जीवन में उतारा था।
कुछ महीनों बाद वह महिला दुकान पर आई और बोली, "मिस्टर गुप्ता, मेरे भाई को अपनी कंपनी के लिए एक ईमानदार हिसाब-किताब रखने वाले व्यक्ति की ज़रूरत है। मैंने उसे बताया कि आपकी बेटी ने एक हज़ार रुपये लौटाए थे। उसे भरोसा है कि आपकी बेटी जैसा ईमानदार इंसान ही यह काम कर सकता है।"
पूजा को वह नौकरी मिल गई। उसका वेतन दुकान की कमाई से कई गुना था। मिस्टर गुप्ता ने पूजा को गले लगाया और कहा, "बेटी, तुमने एक हज़ार रुपये लौटाए और भगवान ने तुम्हें हज़ारों का इनाम दिया। यही सच्चा सिद्धांत है — जो ईमानदार होता है, उसे भगवान कभी भूखा नहीं रखता।"
पूजा ने नई नौकरी में भी वही ईमानदारी बनाए रखी। उसके मालिक उस पर पूरा भरोसा करते थे और कंपनी के हर हिसाब की ज़िम्मेदारी उसे दी जाती थी। सालों बाद जब पूजा ने अपनी बेटी को यह कहानी सुनाई, तो उसने कहा, "बेटी, एक हज़ार रुपये छोटी रकम थी, पर उसने मुझे सिखाया कि ईमानदारी सबसे बड़ा निवेश है। जो इंसान अपनी ईमानदारी पर भरोसा करता है, वह कभी हारता नहीं। चाहे उसे इनाम मिले या न मिले, उसका मन हमेशा शांत रहता है। और मन की शांति, बेटी, किसी भी पैसे से बड़ी होती है।"