अर्जुन शहर में एक ऑफिस में काम करता था। वह एक साधारण युवक था, पर उसकी आदतें अच्छी थीं। एक दिन सुबह बस में जाते समय उसे एक बटुआ मिला। बटुए में दस हज़ार रुपये, एक एटीएम कार्ड और एक पहचान पत्र था। पहचान पत्र पर नाम था — मिसेज़ कामिनी शर्मा।
अर्जुन ने बटुआ खोला और देखा। दस हज़ार रुपये उसके मासिक वेतन का आधा था। उसके मन में विचार आया — बटुआ किसी को मिला हुआ है। कोई देख नहीं रहा। मैं इसे रख लूँ तो किसे पता चलेगा?
वह एक क्षण के लिए रुका। उसके मन में दो आवाज़ें लड़ने लगीं। एक कह रही थी — यह पैसा तुम्हारी मेहनत का इनाम है, भाग्य ने तुम्हें दिया है। दूसरी कह रही थी — यह पैसा किसी और की मेहनत का है, इसे रखना चोरी है। अर्जुन को अपने पिता की बात याद आई, जो हमेशा कहते थे, "बेटा, जो चीज़ तुम्हारी नहीं है, उसे कभी मत रखना। चोरी का पैसा कभी सुख नहीं देता, केवल चैन छीन लेता है।"
उसने बटुए में फिर से देखा। एटीएम कार्ड और पहचान पत्र था — मिसेज़ कामिनी शर्मा। यह किसी महिला का बटुआ था। शायद वह किसी ज़रूरतमंद काम के लिए यह पैसा निकाल रही थी। अर्जुन ने सोचा कि अगर वह इसे रख लेगा, तो मिसेज़ शर्मा को पता भी नहीं चलेगा कि उनका पैसा कहाँ गया। वे सोचेंगी कि कहीं गिर गया। और यह सोचना उसे बहुत बुरा लगा।
पर अर्जुन ने तुरंत अपना मन बदल लिया। "नहीं," उसने सोचा, "यह बटुआ किसी का है। मिसेज़ शर्मा को पता नहीं कि उनका बटुआ कहाँ गिरा। वह परेशान हो रही होंगी। हो सकता है कि यह पैसा किसी ज़रूरी काम के लिए हो।"
अर्जुन ऑफिस जाने के बजाय पहचान पत्र पर लिखा पता देखकर मिसेज़ शर्मा के घर पहुँचा। दरवाज़ा खोलते ही मिसेज़ शर्मा फूट-फूट कर रोने लगीं। "मेरा बटुआ!" उन्होंने कहा। "मुझे लगा मैं इसे हमेशा के लिए खो चुकी हूँ। यह पैसा मेरे पति की दवाई के लिए था। वे बीमार हैं और अस्पताल में हैं।"
अर्जुन ने बटुआ उन्हें लौटा दिया। मिसेज़ शर्मा ने धन्यवाद किया और कुछ रुपये इनाम देने चाहे, पर अर्जुन ने लेने से मना कर दिया। "मैडम," उन्होंने कहा, "यह बटुआ आपका था, मैंने इसे लौटाया है। मुझे कोई इनाम नहीं चाहिए। आप अपने पति का ख्याल रखें।"
मिसेज़ शर्मा अर्जुन की ईमानदारी देखकर बहुत प्रभावित हुईं। उनका बेटा शहर में एक बड़ी कंपनी में मैनेजर था। उन्होंने उसे फोन किया और सारी बात बताई।
कुछ हफ़्तों बाद अर्जुन के ऑफिस में एक चिट्ठी आई। उसे बड़ी कंपनी में नौकरी का निमंत्रण मिला — बेहतर वेतन, बेहतर पद। अर्जुन हैरान रह गया। बाद में उसे पता चला कि मिसेज़ शर्मा के बेटे ने ही उसकी सिफारिश की थी। "जिस युवक ने मेरी माँ का बटुआ लौटाया," उसने कहा था, "वही मेरी कंपनी में काम करने लायक है।"
अर्जुन ने नौकरी स्वीकार की और अपने परिवार का जीवन बेहतर बना दिया। उसके पिता ने उसे गले लगाया और कहा, "बेटा, तुमने दस हज़ार रुपये लौटाए, और बदले में तुम्हें एक बेहतर ज़िंदगी मिली। यही ईमानदारी का इनाम है — कभी-कभी वह तुरंत मिलता है, कभी-कभी बाद में। पर वह हमेशा मिलता है।"
अर्जुन ने यह बात कभी नहीं भूली। जब वह बाद में एक अच्छे पद पर पहुँचा, तो उसने अपने अधीन काम करने वाले युवकों को भी यही सिखाया। "काम में जल्दबाज़ी मत करो, ईमानदारी से करो," वह कहता था। "पैसा जल्दी कमाया जा सकता है, पर नाम एक बार खराब हो जाए तो वापस नहीं आता।" उसकी कंपनी में उसकी गिनती सबसे भरोसेमंद कर्मचारियों में होती थी, और लोग उसे सलाह लेने आते थे। अर्जुन ने सीखा कि एक सच्चा इनाम सिर्फ पैसा नहीं होता — वह आदर होता है, वह विश्वास होता है, और वह चैन होता है जो ईमानदारी देती है। ये सब उसे मिले, क्योंकि उसने एक दिन एक बटुआ लौटाने का फैसला किया था।