रेलवे स्टेशन का पर्स

विक्रम रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी चाय की दुकान चलाता था। उसकी दुकान छोटी थी, पर उसकी नेकी बड़ी थी। स्टेशन के हर कर्मचारी और यात्री उसे जानते थे।

एक दिन दुकान पर एक यात्री आया। उसने चाय पी और जल्दी में अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए भाग गया। जाने के बाद विक्रम ने देखा कि बेंच पर एक पर्स पड़ा है। उसने पर्स खोला तो उसमें एक लाख रुपये थे और एक पहचान पत्र।

विक्रम ने पर्स देखा और सोचा — एक लाख रुपये! यह तो बहुत बड़ी रकम है। उसकी दुकान की मासिक कमाई शायद पंद्रह हज़ार भी नहीं होती। यह रकम उसकी कई साल की कमाई के बराबर थी।

उसके मन में विचार आया कि वह पर्स रख ले। कोई देख नहीं रहा था। पर विक्रम ने तुरंत सोचा — यह पैसा किसी का है। यह यात्री कहीं जा रहा होगा। शायद यह पैसा उसके परिवार के लिए हो, शायद किसी इलाज के लिए। अगर उसे पता चलेगा कि उसका पर्स खो गया, तो वह बहुत परेशान होगा।

विक्रम ने पहचान पत्र देखा। यात्री का नाम था — सुरेश यादव। पर्स में उसका मोबाइल नंबर भी था। विक्रम ने तुरंत फोन किया। "सुरेश जी," उन्होंने कहा, "आपने मेरी दुकान पर पर्स भूल गए हैं। कृपया लौटकर ले जाइए।"

सुरेश यादव, जो ट्रेन में बैठकर राहत की साँस ले रहे थे, हैरान रह गए। वे तुरंत अगले स्टेशन पर उतरे और वापस आए। पर्स पाकर उनकी आँखों में आँसू थे। "विक्रम भाई," उन्होंने कहा, "इसमें मेरी कंपनी का एक लाख रुपये था, जो मैं बैंक में जमा करने ले जा रहा था। अगर यह खो जाता, तो मेरी नौकरी चली जाती। आपने मेरी ज़िंदगी बचा ली।"

सुरेश ने विक्रम को इनाम देना चाहा, पर विक्रम ने मना कर दिया। "यह पर्स आपका था," उन्होंने कहा, "मैंने इसे लौटाया है। मुझे कुछ नहीं चाहिए।"

विक्रम की इस बात को सुनकर सुरेश के मन में बहुत सम्मान पैदा हुआ। उन्होंने सोचा कि जिस आदमी ने एक लाख रुपये देखकर भी उन्हें लौटा दिए, वह कितना सच्चा इंसान होगा। सुरेश ने विक्रम का नंबर लिया और चले गए, पर उन्होंने यह कहानी अपने दोस्तों और सहकर्मियों को ज़रूर बताई। उन्होंने सोचा कि ऐसे ईमानदार इंसान को शायद कभी मदद की ज़रूरत पड़े, और वे मदद करेंगे।

कुछ महीनों बाद उन्होंने विक्रम को अपनी कंपनी की कैंटीन का ठेका दे दिया — एक ऐसा ठेका जो विक्रम की पुरानी दुकान से कई गुना बड़ा था। सुरेश की कंपनी के कर्मचारी विक्रम की चाय और खाने की तारीफ करते थे, और विक्रम की ईमानदारी की कहानी कंपनी में फैल गई।

विक्रम का जीवन बदल गया। उसने अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजा और अपना घर बनाया। उसके पड़ोसियों ने उससे पूछा, "विक्रम, तुमने एक लाख रुपये लौटा दिए और आज तुम करोड़पति बन गए। क्या तुम्हें कभी पछतावा हुआ?"

विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, "पछतावा? भाई, जो पैसा मेरा नहीं था, उसे रखकर मैं कभी चैन से सो नहीं पाता। एक लाख रुपये एक दिन खर्च हो जाते। पर मेरी ईमानदारी ने मुझे एक ज़िंदगी दे दी। यही ईमानदारी का इनाम है — वह आपको कभी धोखा नहीं देती।"
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