सोने का सिक्का

गाँव के छोटे से स्कूल में पढ़ने वाली रिया नौ साल की थी। उसके पिता एक किसान थे और माँ घर संभालती थीं। घर में खुशहाली नहीं थी, पर प्यार की कमी नहीं थी। रिया हर सुबह स्कूल जाते समय मंदिर के रास्ते से गुजरती थी।

एक दिन स्कूल जाते समय रिया ने रास्ते में कुछ चमकता हुआ देखा। वह रुकी और झुककर देखा — वह एक सोने का सिक्का था। रिया का दिल ज़ोर से धड़का। उसने सिक्का उठाया और हथेली में रखकर देखा। यह असली सोना था। उसने जीवन में कभी इतना कीमती सिक्का नहीं देखा था।

उसका मन कर रहा था कि वह सिक्का जेब में रख ले। उसके पास नया जूता नहीं था। उसकी सहेलियों के पास रंग-बिरंगे रिबन थे, जो उसके पास नहीं थे। इस सिक्के से वह बहुत कुछ खरीद सकती थी।

पर रिया ने सोचा — यह सिक्का किसी का होगा। कोई व्यक्ति इसे खो कर परेशान हो रहा होगा। हो सकता है कि वह सिक्का किसी गरीब आदमी की जमा-पूँजी हो। रिया ने आसपास देखा। कोई नहीं दिखा। वह स्कूल चली गई, पर सिक्का उसके हाथ में ही था।

स्कूल पहुँचकर रिया ने अपनी टीचर, मिसेज़ डिसूज़ा को बुलाया और सारी बात बताई। "मैम," रिया ने कहा, "मुझे रास्ते में सोने का सिक्का मिला है। मैं नहीं जानती कि किसका है। मैं इसे अपने पास नहीं रखना चाहती। आप बताइए, मैं क्या करूँ?"

मिसेज़ डिसूज़ा ने सिक्का देखा और हैरान रह गईं। "रिया, तुम बहुत अच्छी लड़की हो," उन्होंने कहा। "इतना कीमती सिक्का पाकर भी तुमने सोचा कि यह किसी और का है। मैं यह सिक्का प्रधानाध्यापक को दिखाती हूँ। हम स्कूल में सूचना लगा देंगे कि रास्ते में सोने का सिक्का मिला है, जो भी इसे खोए, वह आकर बताए।"

सूचना लगाई गई। तीसरे दिन एक बूढ़ा आदमी स्कूल आया। उसकी आँखें नम थीं। "यह सिक्का मेरा है," उसने कहा। "मैंने अपनी बेटी की शादी की जोड़ी बेची थी और यह सिक्का उसकी याद में रखा था। मैं इसे खोकर बहुत दुखी था।"

रिया ने सिक्का उसे लौटा दिया। बूढ़े आदमी की आँखों से आँसू बहने लगे। "बेटी," उसने रिया से कहा, "तुमने मुझे सिर्फ एक सिक्का नहीं लौटाया। तुमने मुझे मेरी बेटी की याद लौटाई है। मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा।"

कुछ दिनों बाद बूढ़ा आदमी फिर स्कूल आया। इस बार उसके साथ उसका बेटा था, जो शहर में कारोबार करता था। "रिया," बूढ़े ने कहा, "मेरे बेटे को एक ईमानदार लड़की की ज़रूरत है, जो उसकी दुकान पर बैठकर हिसाब-किताब रखे। मुझे लगता है तुम सही लड़की होगी। जब तुम बड़ी हो जाओगी, तुम उसकी दुकान पर काम कर सकती होगी।"

रिया के पिता की आँखों में खुशी के आँसू थे। "देखो बेटी," उन्होंने कहा, "ईमानदारी का इनाम सिर्फ एक सिक्का नहीं होता। आज तुमने एक सिक्का लौटाया, और भगवान ने तुम्हें भविष्य में एक नौकरी का रास्ता दिखा दिया। ईमानदारी कभी खाली हाथ नहीं जाती, बेटी। वह हमेशा कुछ न कुछ लेकर लौटती है।"

रिया ने सीखा कि ईमानदारी का सबसे बड़ा इनाम इनाम ही नहीं होता — वह शांति होती है, वह विश्वास होता है, और वह आदर होता है जो लोग एक ईमानदार इंसान को देते हैं। सोने का सिक्का एक दिन खर्च हो जाता, पर रिया की ईमानदारी की कहानी गाँव में वर्षों तक याद रखी गई।
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